आदिल नगर में सफाई व्यवस्था बेपटरी, कागजों पर दौड़ रहा जोन-7 का स्वच्छता तंत्र

नालियां खुद साफ कर रहे लोग, कूड़ा उठाने वाला कोई नहीं; सफाई कर्मियों पर वीडियो बनाकर हाजिरी लगाने और पैसे मांगने तक के आरोप
अपर नगर आयुक्त के निरीक्षण के बाद भी नहीं सुधरे हालात, जोनल अधिकारी और सेनेटरी अफसर की मॉनिटरिंग पर सवाल
लखनऊ। एक तरफ नगर निगम प्रशासन स्वच्छ सर्वेक्षण में राजधानी को नंबर-1 बनाने का लक्ष्य लेकर अधिकारियों को लगातार मैदान में उतरने और सफाई व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दे रहा है, वहीं जोन-7 के शंकरपुरवा द्वितीय स्थित आदिल नगर की तस्वीर इन दावों को कठघरे में खड़ा कर रही है। इलाके में जगह-जगह कूड़ा, बजबजाती नालियां, मच्छरों की भरमार और डोर-टू-डोर कूड़ा संग्रहण की बदहाल व्यवस्था से स्थानीय लोग परेशान हैं।

नगर आयुक्त गौरव कुमार पूर्व में साफ निर्देश दे चुके हैं कि स्वच्छता मानकों में लापरवाही स्वीकार नहीं होगी और लक्ष्य लखनऊ को स्वच्छता रैंकिंग में शीर्ष पर पहुंचाना है। महापौर सुषमा खर्कवाल भी स्वच्छ सर्वेक्षण-2026 की तैयारियों में सफाई और जलनिकासी को लेकर अधिकारियों को सख्त निर्देश दे चुकी हैं। ऐसे में आदिल नगर की स्थिति सवाल खड़ा करती है कि मुख्यालय से निकलने वाले निर्देश जोन-7 की गलियों तक पहुंचते-पहुंचते आखिर बेअसर क्यों हो जाते हैं?

🔴 अपर नगर आयुक्त पहुंचे थे क्षेत्र में, फिर भी हालात जस के तस
स्थानीय लोगों के मुताबिक कुछ दिन पहले जलभराव की समस्या को लेकर अपर नगर आयुक्त अभिनव रंजन श्रीवास्तव ने क्षेत्र का दौरा किया था। लोगों को उम्मीद थी कि वरिष्ठ अधिकारी के निरीक्षण के बाद सफाई और जलनिकासी व्यवस्था में सुधार दिखाई देगा, लेकिन आरोप है कि कुछ दिनों बाद ही व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आई।

अब सवाल जोनल अधिकारी, जोनल सेनेटरी अफसर और क्षेत्रीय सफाई निरीक्षण व्यवस्था पर खड़ा हो रहा है। आखिर नियमित निरीक्षण हो रहा है तो सड़कों और गलियों में कूड़ा क्यों पड़ा है? नालियों की सफाई के बाद निकली सिल्ट समय से क्यों नहीं उठती? और यदि निरीक्षण नहीं हो रहा तो जिम्मेदार अधिकारी किस आधार पर क्षेत्र को साफ बता रहे हैं?
🔴 महिलाओं का दर्द—‘अपनी नाली खुद साफ करनी पड़ती है’
आदिल नगर की महिलाओं का कहना है कि कई जगह हालत ऐसी है कि नालियां उन्हें स्वयं साफ करनी पड़ती हैं। आरोप है कि कूड़ा उठाने के लिए कर्मचारी नियमित नहीं आते। स्थानीय निवासियों ने यह भी शिकायत की कि कुछ सफाई कर्मचारी आसपास बैठकर समय काटते हैं और काम कराने के लिए लोगों को बार-बार कहना पड़ता है।
कुछ निवासियों ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि “वीडियो बनाकर हाजिरी पूरी कर दी जाती है, लेकिन सफाई जमीन पर नजर नहीं आती।” लोगों का आरोप है कि कुछ मामलों में सफाई के बदले पैसे की मांग तक की जाती है। इन आरोपों की विभागीय जांच आवश्यक है, क्योंकि यदि शिकायतें सही पाई जाती हैं तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि नगर निगम की पूरी निगरानी व्यवस्था पर सवाल होगा।
🔴 नाली साफ हुई तो सिल्ट सड़क पर, बारिश आई तो वापस नाली में
स्थानीय लोगों की सबसे बड़ी शिकायत सफाई के तरीके को लेकर है। आरोप है कि कभी नाली साफ भी की जाती है तो उससे निकला कूड़ा और सिल्ट सड़क किनारे छोड़ दिया जाता है। समय पर उठान नहीं होने से बारिश में वही गंदगी दोबारा नाली में पहुंच जाती है।
🔴 यानी कागजों में नाली साफ, लेकिन जमीन पर समस्या वहीं की वहीं।
बारिश के दौरान यही बंद नालियां जलभराव का कारण बनती हैं। इसके बाद पानी उतरने तक लोग परेशानी झेलते हैं और जमा पानी व गंदगी के कारण मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है।
🔴 फोन नहीं उठाते अधिकारी-कर्मचारी, शिकायत करें तो किससे?
क्षेत्रीय लोगों का आरोप है कि समस्या बताने के लिए फोन किया जाए तो कई बार न कर्मचारी जवाब देते हैं और न संबंधित जिम्मेदार अधिकारी। लोगों का सवाल है कि जब नागरिकों की शिकायत सुनने तक की व्यवस्था प्रभावी नहीं है, तो स्वच्छता अभियान की सफलता का आकलन आखिर किस आधार पर किया जा रहा है?
यही स्थिति जोनल अधिकारी और जोनल सेनेटरी अफसर की फील्ड मॉनिटरिंग को भी सवालों के घेरे में लाती है। सफाई निरीक्षक यदि नियमित क्षेत्र भ्रमण कर रहे हैं तो गंदगी क्यों नहीं दिख रही? और यदि स्थिति अधिकारियों तक पहुंच ही नहीं रही तो सुपरविजन की पूरी श्रृंखला क्या सिर्फ कागजी रिपोर्टों पर निर्भर है?

🔴 डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन भी सवालों में
स्थानीय लोगों का कहना है कि आदिल नगर में डोर-टू-डोर कूड़ा संग्रहण व्यवस्था बेहद कमजोर है। कई स्थानों से नियमित कूड़ा नहीं उठने के कारण सड़क किनारे कचरे के ढेर लग रहे हैं।
लोगों ने लखनऊ स्वच्छता अभियान प्राइवेट लिमिटेड की स्थानीय व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। आरोप है कि एजेंसी के जिम्मेदार अधिकारी क्षेत्र का नियमित निरीक्षण नहीं करते, जबकि मुख्य मार्गों से लेकर अंदरूनी गलियों तक कई स्थानों पर कूड़ा नजर आता है।

नगर निगम की अपनी स्वच्छता कार्ययोजना में जोन-7 के लिए डोर-टू-डोर कूड़ा संग्रहण हेतु वाहन और निर्धारित समय की व्यवस्था दर्ज है। ऐसे में जमीन पर संग्रहण व्यवस्था कमजोर मिलने पर एजेंसी और निगम,दोनों स्तरों पर जवाबदेही तय होना जरूरी है।
🔴 स्वच्छ वायु में नंबर-1 लखनऊ, अब गलियों की परीक्षा
हाल ही में स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में लखनऊ ने देश में पहला स्थान हासिल किया और महापौर सुषमा खर्कवाल व नगर आयुक्त गौरव कुमार ने राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार ग्रहण किया। यह उपलब्धि राजधानी के लिए गौरव की बात है, लेकिन आदिल नगर जैसे इलाकों की तस्वीर यह भी याद दिलाती है कि किसी शहर की असली स्वच्छता का पैमाना पुरस्कारों के साथ-साथ उसकी गलियां, नालियां और मोहल्ले भी होते हैं।

अब निगाह नगर आयुक्त गौरव कुमार और महापौर सुषमा खर्कवाल पर है कि आदिल नगर की इन शिकायतों का स्थलीय सत्यापन कब कराया जाता है और यदि लापरवाही मिलती है तो जोनल अधिकारी, जोनल सेनेटरी अफसर, सफाई निरीक्षण तंत्र तथा संबंधित निजी एजेंसी की जवाबदेही किस स्तर पर तय होती है।

🔴 सवाल जो जवाब मांगते हैं❓
◾क्या सफाई निरीक्षकों की फील्ड उपस्थिति का भौतिक सत्यापन होता है?
◾क्या डोर-टू-डोर कलेक्शन वाहनों की GPS/रूट मॉनिटरिंग की जा रही है?
◾नाली से निकली सिल्ट उठाने की समयसीमा क्या है और उसकी जांच कौन करता है?
◾स्थानीय लोगों की शिकायतों पर कार्रवाई की समीक्षा कौन कर रहा है?
◾और सबसे अहम,जब वरिष्ठ अधिकारी निरीक्षण कर चुके हैं, तो आदिल नगर की हालत फिर बदहाल कैसे हो गई?


