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अंग्रेजों की बेदखली तक ‘किलेदार’ परिवारके आंगन में धधकती रही आजादी की ज्वाला

इसके बाद होल्कर कालेज इंदौर में दाखिला लेकर एलएलबी परीक्षा उत्तीर्ण की। प्रतिभा के बूते विद्यालयीन प्रतियोगिता में कालेज का प्रतिनिधित्व करके उन्होंने आठ बार प्रथम स्थान हासिल किया। 1955 से 1970 तक वकालत करने की लेकिन इससे उनको विरक्ति हो गयी और यह पेशा उन्होंने छोड़ दिया। ओशो के भक्त रहे तन्मय बुखारिया का जीवन बेहद सादगी में गुजरा। जनपद में उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में तमाम कार्य किये, जो आज भी मील के पत्थर साबित हो रहे हैं। 26 नवंबर 1997 में उन्होंने अपने घर पर अंतिम सांस ली।





