लखनऊ नगर निगम जोन-8 में इंजीनियर-ठेकेदार गठजोड़ का गटर खुला!

सरकारी मशीन से ठेकेदार का काम… ड्राइवर बना दलाल?
लखनऊ। नगर निगम लखनऊ के जोन-8 में फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जा रही है , ठेकेदार मलाई काट रहे हैं और अभियंता आंखें मूंदे बैठे हैं। जबकि नगर आयुक्त गौरव कुमार ने हाल ही में सख्त शब्दों में कहा था कि “लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी”, मगर अभियंत्रण विभाग के अफसर शायद इस चेतावनी को हास्य की तरह ले रहे हैं।
ताज़ा मामला आशियाना चौराहे से खजाना होते हुए बंगला पुलिस चौकी तक और पॉवर हाउस चौराहे से स्मृति प्लाजा तक के नालों की सफाई से जुड़ा है, जहां मेसर्स लक्ष्मी ट्रेडर्स नामक फर्म को सफाई का ठेका मिला है। लेकिन खेल कुछ यूं चल रहा है कि टेंडर निजी फर्म का, काम नगर निगम की मशीन से, और वह भी निगम के ड्राइवर से!
सवाल ये है…
- क्या नगर निगम अब ठेकेदारों के लिए मुफ़्त में ‘सेवा’ देने लगा है?
- क्या सरकारी संसाधनों की लूट को ही अब “सिस्टम” मान लिया गया है?
- क्या अभियंता अब खुद को नियमों से ऊपर समझने लगे हैं?
सूत्रों की मानें तो अधिशासी अभियंता शील कुमार श्रीवास्तव और जूनियर इंजीनियर राजेंद्र प्रसाद की भूमिका इस मामले में संदिग्ध ही नहीं, बल्कि साक्ष्यों के साथ उजागर हो चुकी है। GPS लोकेशन, वीडियो और पहले-पिछले वर्षों की फोटोज यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि ठेकेदार को बार-बार बिना मेहनत के भुगतान का रास्ता दिखाया जा रहा है।
निगम के ड्राइवर को बना दिया ‘ठेकेदार का कर्मचारी’!
जिस ड्राइवर को नगर निगम की गाड़ी चलाकर शहर को स्वच्छ बनाने का जिम्मा दिया गया है, वही ड्राइवर अब ठेकेदार के काम में लगा है। ऐसा लगता है जैसे ड्राइवरों की ड्यूटी अब आदेश पत्र से नहीं, जेब से तय होती है।
मेसर्स लक्ष्मी ट्रेडर्स’ को सरकारी मशीनरी का तोहफा क्यों?
सवाल उठता है कि जब लाखों रुपये में टेंडर फर्म को मिला है, तो फिर नाले की सफाई नगर निगम की मशीन और मैनपावर से क्यों कराई जा रही है? क्या यह अनुबंध की सीधी-सीधी अवहेलना नहीं?
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नगर आयुक्त से अपील
नगर आयुक्त गौरव कुमार से निवेदन है कि इस मामले को “संपादकीय सूचना” न समझा जाए, बल्कि आंतरिक भ्रष्टाचार की फाइल मानी जाए। अगर जांच नहीं हुई, तो यह संदेह स्वाभाविक होगा कि इस खेल की परछाई कहीं ऊपर तक फैली है।
जब सरकारी मशीन से ठेकेदार की जेब भरे, तो समझिए व्यवस्थाबीमार नहीं, सौदेबाज़ हो चुकी है।
अगर नगर निगम वास्तव में लखनऊ को स्मार्ट सिटी बनाना चाहता है, तो सबसे पहले उसे अपने ‘स्मार्ट चोरों’ की पहचान करनी होगी। निगम को चाहिए कि इस तरह के मामलों में अभियंता और फर्म दोनों पर न केवल जुर्माना लगाए, बल्कि भविष्य में निगम से कोई भी ठेका देने पर स्थायी प्रतिबंध लगा दे।



