उन्नाव:- पुलिस की लापरवाही से उठे गंभीर सवाल, क्या सुरक्षा सिर्फ दिखावे तक सीमित है।

उन्नाव से जिला संवाददाता अनुज तिवारी
शनिवार को बांगरमऊ तहसील में आयोजित समाधान दिवस में एक मामला सामने आया, जिसने पुलिस की कार्यशैली और उसकी निष्क्रियता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। एक 12 वर्षीय बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म को लेकर पुलिस की लापरवाही ने न केवल पीड़िता के परिवार को तड़पाया, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच भी गहरी नाराजगी पैदा की। पुलिस ने दुष्कर्म को छेड़छाड़ बना दिया? फतेहपुर चौरासी के एक पिता ने आरोप लगाया कि उसकी बेटी के साथ दुष्कर्म हुआ, लेकिन पुलिस ने उसे छेड़छाड़ का मामला बना दिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक बच्ची के साथ इतना गंभीर अपराध हुआ, तो क्या पुलिस ने जानबूझकर आरोपियों को बचाने की कोशिश की? इससे भी गंभीर बात यह है कि पुलिस ने पीड़िता को नहलाकर और उसके कपड़े धुलवाकर साक्ष्य नष्ट करने की कोशिश की। क्या यह कार्यवाही पुलिस की मंशा पर सवाल नहीं उठाती? क्या प्रशासन और पुलिस दोनों ने आंखें मूंद ली हैं? इस घटना के बाद भी पीड़ित परिवार तहसील और जिला कार्यालय के चक्कर काट रहा है, लेकिन अब तक उसे न्याय नहीं मिला। क्या यह पुलिस की निष्क्रियता नहीं है? क्या अधिकारी सिर्फ आदेशों के कागजों पर ही काम करते हैं, जबकि असल ज़िंदगी में जनता पीड़ित हो रही है?

क्या पुलिस सिर्फ चेकिंग और टिकट काटने तक सीमित है? उन्नाव में पुलिस की भूमिका पर एक गंभीर सवाल उठता है—क्या पुलिस का काम केवल टिकट काटने और चेकिंग तक सीमित हो गया है? जबकि असली अपराध और पीड़ितों के साथ हो रहे जघन्य अपराधों को नजरअंदाज किया जा रहा है। क्या पुलिस का प्राथमिक कर्तव्य अपराधियों को सजा दिलवाना नहीं है? पुलिस की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल क्या पुलिस ने कभी यह सोचा है कि जब एक बच्ची के साथ दुष्कर्म हो, तो उसके परिवार को कितना मानसिक आघात लगता है? क्या पुलिस अपनी कार्यशैली को सुधारने के बजाय, केवल अपने कर्तव्यों को दिखावे तक सीमित कर रही है? अब सवाल उठता है: पुलिस कब जागेगी? फतेहपुर चौरासी में हुआ यह जघन्य अपराध, पुलिस की लापरवाही और नकली कार्रवाई का उदाहरण बन चुका है। समाधान दिवस में प्रशासन पर सवालों की बौछार, क्या यह सिर्फ दिखावा था? सड़क, बिजली और सुविधाओं पर खामोशी: स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्मारक के पास सड़क की जर्जर हालत और बिजली के खंभों की स्थिति पर प्रशासन का ध्यान क्यों नहीं गया? क्या समस्या को सुलझाने के बजाय इसे सिर्फ टालने की नीति अपनाई जा रही है? वृक्षारोपण और ट्राई साइकिल वितरण: समाधान दिवस के अंत में वृक्षारोपण, दिव्यांगों को ट्राई साइकिल वितरित करना और वाटर कूलर का उद्घाटन हुआ। क्या यह महज एक दिखावा था? प्रशासन को यह समझने की ज़रूरत है कि समस्याओं का समाधान असली कार्रवाई से होता है, न कि शो से! स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार: क्या स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार सिर्फ फल और सिक्के भेंट देने से होगा? क्या प्रशासन के पास असली सुधार के लिए ठोस कदम हैं, या फिर यह भी सिर्फ एक और दिखावा है? समाधान दिवस में 64 शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें से कुछ का तत्काल निस्तारण किया गया। क्या यह सच में समाधान था, या सिर्फ एक कागजी खानापूरी? सवाल यह है कि क्या पुलिस सिर्फ रैंक और फाइल के कामों में उलझी रहेगी, या फिर सिस्टम में बदलाव लाकर पीड़ितों को न्याय दिलवाने का सही प्रयास करेगी?




