तमिलनाडु में डॉक्टर ने कार में खुद को IV फ्लूइड देकर की आत्महत्या
तमिलनाडु में डॉक्टर ने कार में खुद को IV फ्लूइड देकर की आत्महत्या, मानसिक स्वास्थ्य पर फिर उठे सवाल

कोडईकनाल (तमिलनाडु), 7 जून 2025 — तमिलनाडु के कोडईकनाल में एक युवा डॉक्टर ने कथित तौर पर खुद को IV फ्लूइड (इंट्रावेनस फ्लूइड) देकर आत्महत्या कर ली। यह दर्दनाक घटना एक बार फिर से युवा पेशेवरों में मानसिक स्वास्थ्य संकट को उजागर कर रही है।
मृतक की पहचान डॉ. जोशुआ समराज के रूप में हुई है, जो सेलम के निवासी थे और मदुरै में एक पोस्टग्रेजुएट मेडिकल स्टूडेंट के रूप में कार्यरत थे।
3 दिन से खड़ी कार से हुआ खुलासा
स्थानीय लोगों ने पुलिस को सूचित किया कि पूमपरई के पास जंगल क्षेत्र में एक कार पिछले तीन दिनों से एक ही स्थान पर खड़ी है। पुलिस मौके पर पहुंची और कार का दरवाज़ा खोलते ही डॉक्टर का शव बरामद हुआ। पास में IV फ्लूइड्स और चिकित्सीय उपकरण पाए गए, जिससे यह आशंका जताई गई कि डॉक्टर ने खुद को फ्लूइड देकर जान ली है।
आत्महत्या की पुष्टि, सुसाइड नोट मिला
पुलिस ने बताया कि कार से एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ है जिसमें डॉ. जोशुआ ने अपने परिवार से माफ़ी मांगी है, लेकिन किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति को आत्महत्या का कारण नहीं बताया है।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने NDTV को बताया, “ऑनलाइन गेमिंग में नुकसान की अफवाहें थीं, लेकिन सुसाइड नोट में इसका कोई उल्लेख नहीं है और न ही माता-पिता ने ऐसी कोई बात कही है। हम सभी पहलुओं की जांच कर रहे हैं।”
पारिवारिक और मानसिक तनाव बने कारण
पुलिस को दिए बयान में डॉ. जोशुआ के माता-पिता ने कहा कि वह पिछले कुछ समय से डिप्रेशन में थे और उन्हें व्यक्तिगत रिश्तों में तनाव का सामना करना पड़ रहा था। इसके साथ ही, उन पर आर्थिक बोझ भी था, जो उनकी मानसिक स्थिति को और बिगाड़ रहा था।
शव पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया, मामला दर्ज
पुलिस ने मामला दर्ज कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। अंतिम मृत्यु का कारण ऑटोप्सी रिपोर्ट आने के बाद स्पष्ट होगा। घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस पूरी जांच कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि डॉक्टर को आत्महत्या के लिए किन परिस्थितियों ने मजबूर किया।
युवा डॉक्टरों में मानसिक स्वास्थ्य पर बड़ा सवाल
इस दर्दनाक घटना ने एक बार फिर से यह सवाल उठाया है कि युवा मेडिकल पेशेवरों की मानसिक स्थिति कितनी नाजुक हो गई है। मेडिकल की पढ़ाई और पेशेवर जीवन में भारी दबाव, लंबे घंटे की ड्यूटी, और अपेक्षाओं का बोझ मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल रहा है।
भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, 30% से अधिक मेडिकल छात्र डिप्रेशन और चिंता से जूझते हैं, लेकिन उनमें से केवल 10% ही किसी मनोवैज्ञानिक या चिकित्सक से मदद लेते हैं।
एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक का कहना है, “जो लोग हमें ठीक करते हैं, अक्सर खुद को अनदेखा कर देते हैं। ऐसे मामलों से हमें सीख लेनी चाहिए और हेल्थ प्रोफेशनल्स के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता को अनिवार्य बनाना चाहिए।”
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया और सुधार की मांग
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर दुख और गुस्से की लहर दौड़ गई है। कई यूजर्स और हेल्थ एक्टिविस्ट्स ने तमिलनाडु सरकार से मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कठोर नीतियों की मांग की है।
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वकालत की जा रही है कि मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में 24×7 मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग सेंटर की स्थापना की जाए, ताकि छात्र और रेजिडेंट डॉक्टर समय रहते मानसिक दबाव से बाहर आ सकें।
एक ज़िम्मेदारी समाज की भी है
डॉ. जोशुआ समराज की असमय और दुखद मृत्यु हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम, एक समाज के रूप में, अपने चिकित्सकों को वह मानसिक और भावनात्मक सहारा दे रहे हैं, जिसकी उन्हें आवश्यकता है?
यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो मानसिक स्वास्थ्य संकट और गहराता जाएगा।



