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निमिषा सोनकर “दरियाबादी” की कविता संतुष्टी : ज़रूरतमंदों की मदद और मानवता की सच्ची तस्वीर

मानवता की मिसाल बनी कविता संतुष्टी

समाज में सेवा और त्याग की भावना को शब्दों में पिरोकर पेश करने वाली कवयित्री निमिषा सोनकर “दरियाबादी” की नई कविता संतुष्टी आज चर्चा में है। इस कविता में उन्होंने यह संदेश दिया है कि किसी ज़रूरतमंद की मदद करना ही इंसानियत का सबसे बड़ा धर्म है।

कविता के माध्यम से कवयित्री ने अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने एक बीमार पिता के इलाज के लिए उनके बेटे की मदद की, और इस छोटे से प्रयास ने एक परिवार को नया जीवन दिया।

कविता की मुख्य भावनाएं

कविता संतुष्टी में कवयित्री ने दिखाया है कि –

  • जरूरतमंदों की मदद करना किसी को बहन, दीदी और मसीहा बना देता है।
  • अहंकार से दूर रहकर जमीन से जुड़ा रहना ही सच्ची इंसानियत है।
  • एक छोटे से प्रयास से भी किसी की जिंदगी बच सकती है और वही मदद सबसे बड़ी सेवा कहलाती है।
  • दूसरों की खुशी से मिलने वाली आत्मिक शांति और संतुष्टि शब्दों में बयान नहीं की जा सकती।

रक्तदान और मदद का संदेश

इस कविता में एक प्रसंग ऐसा भी है जिसमें कवयित्री याद करती हैं कि कैसे एक बार डॉक्टर से निवेदन कर एक बच्चे के लिए ब्लड की व्यवस्था करवाई गई थी। उस दिन उन्होंने एक पिता की आँखों के तारे को बचा लिया था।

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यह प्रसंग समाज को यह सिखाता है कि रक्तदान और जरूरत के समय मदद किसी भी इंसान की सबसे बड़ी सेवा हो सकती है।

समाज के लिए प्रेरणा

कविता संतुष्टी सिर्फ एक साहित्यिक रचना नहीं बल्कि मानवता का पैगाम है। कवयित्री ने यह साबित किया है कि ईश्वर ने हमें सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों की मदद के लिए भी बनाया है।

इस कविता के अंत में निमिषा सोनकर “दरियाबादी” ईश्वर और उन सभी का धन्यवाद करती हैं जिन्होंने उनके कर्तव्य को निभाने में साथ दिया।

ज़रूरतमन्दों की मदद कर
जाने अनजाने मैं कुछ कर जाती हूं,
किसी की दीदी,किसी की बहन,किसी की मसीहा बन जाती हूं।

वो कहते हैं बहुत ज़मीनी हैं आप,
नहीं ऊंचे पद के अहंकार में हैं आप।

आज पता चला,कि उस रोज़ जो डॉक्टर साहब से निवेदन कर जिस बच्चे को blood दिलवाया था,
उस दिन मैंने एक पिता के आंखों के तारे को बचाया था।

आज एक रोता हुआ, टूटा हुआ,असहाय बेटा,
नहीं जिसकी कोई सिफारिश थी
मेरे दर आया था ।
उसके सच्चे आंसुओं ने
मेरे हृदय को आघात पहुंचाया था।

किताबों वाले हाथों में,
हालातों ने,पिता की बीमारी का बिल पकड़ाया था,
शायद जिसको,
वह अपनी जमीन बेच के भर पाया था।

खुद से मैं बोली, शायद इसकी मदद ही सच्ची सेवा कहलाएगी,
अगर मेरे एक छोटे से प्रयास से इसके पिता की जान बच जाएगी।

लेके ऊपर वाले का नाम,
प्रयास किया मैने सच्चे दिल से,
विजय मैंने पाई,
एक मरीज को सही हाथों में पहुंचा जो, मैं पाई।
अब बात की जब मैने उस टूटे हुए बेटे से,
तो खुशी संतुष्टि की आवाज मेरे कानों से टकराई।
उसकी इस खुशी को सुन आँखें भर आई, पर अब जाकर हृदय को संतुष्टि मिल पाई।

कोटि कोटि धन्यवाद उन सभी का जिन्होंने मेरे इस कर्तव्य में,
अपना भी धर्म निभाया।
धन्यवाद उस ईश्वर का जिसने मुझे इस काबिल है बनाया,
इस काबिल है बनाया।

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सूचना इंडिया न्यूज़ चैनल के अनुभवी पत्रकारों और लेखकों की पूरी टीम काम कर रही हैं, सूचना इंडिया के एडिटोरियल टीम के पास 15 वर्षों का गहन अनुभव है। राजनीति, सामाजिक मुद्दों, और अर्थव्यवस्था पर उनकी रिपोर्ट्स और लेखन शैली ने उन्हें मीडिया जगत में विशेष पहचान दिलाई है। सूचना इंडिया ने विगत 15 वर्षों में कई महत्वपूर्ण रिपोर्ट्स का नेतृत्व किया है और पत्रकारिता में निष्पक्षता और नैतिकता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें एक विश्वसनीय आवाज बनाया है। उन्होंने अपने काम के लिए कई पुरस्कार प्राप्त किए हैं और युवा पत्रकारों को मार्गदर्शन देने में भी सक्रिय हैं।

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