तबादला कई का, रिलीव सिर्फ देवेंद्र वर्मा; जोन-दो में ‘जलोटा साहब’ के सुर पर उठे सवाल

सफाई, राजस्व और अभियंत्रण संवर्ग में कई तबादले, अधिकांश अब भी कुर्सी पर; राम सकल यादव की सेवानिवृत्ति से पहले जोन-दो की चार्ज गणित भी चर्चा में
लखनऊ। नगर निगम लखनऊ में शासन स्तर से हुए हालिया तबादलों के बाद अब कर्मचारियों और अधिकारियों को कार्यमुक्त करने की प्रक्रिया सवालों के घेरे में है। सफाई, राजस्व और अभियंत्रण संवर्ग में कई अधिकारियों-कर्मचारियों के दूसरे जिलों में स्थानांतरण की जानकारी सामने आई है, लेकिन इनमें से अधिकांश अब तक नगर निगम में काम कर रहे हैं। इसी बीच नगर आयुक्त की अनुपस्थिति में प्रभारी नगर आयुक्त रहे अपर नगर आयुक्त पंकज श्रीवास्तव द्वारा सफाई निरीक्षक देवेंद्र वर्मा को कार्यमुक्त किए जाने से नगर निगम के भीतर चर्चा तेज हो गई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार सफाई संवर्ग में कुलदीपक यादव, राजेश यादव, सचिन सक्सेना, मोहम्मद नईम, राजेश कुशवाहा और देवेंद्र वर्मा के दूसरे जिलों में स्थानांतरण हुए हैं। वहीं राजस्व संवर्ग में राजस्व अधीक्षक ओमप्रकाश सोनी तथा राजस्व निरीक्षक राजा भैया, विवेक मिश्रा और राहुल यादव , अवनीश के भी स्थानांतरण बताए जा रहे हैं।
इनमें अधिकांश के कार्यमुक्त न होने की बात सामने आ रही है, जबकि देवेंद्र वर्मा की रिलीविंग कर दी गई। ऐसे में नगर निगम के भीतर सवाल उठ रहा है कि जब तबादला आदेश कई लोगों के लिए था तो रिलीविंग की तेजी सिर्फ एक कर्मचारी के मामले में क्यों दिखाई गई?

🔴 जोन-दो में चार्ज की कुर्सी और अचानक रिलीविंग
पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू जोन-दो से जुड़ा बताया जा रहा है। यहां तैनात जोनल सेनेटरी ऑफिसर राम सकल यादव इसी महीने सेवानिवृत्त होने वाले हैं। देवेंद्र वर्मा भी जोन-दो में तैनात थे और विभागीय वरिष्ठता को देखते हुए राम सकल यादव की सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने की चर्चा नगर निगम के गलियारों में चल रही थी।
इसी बीच देवेंद्र वर्मा का कार्यमुक्त होना सवाल खड़े कर रहा है।
नगर निगम के कर्मचारियों के बीच चुटकी लेते हुए चर्चा है कि जोन-दो के ‘जलोटा साहब’ के सुर कुछ ऐसे लगे कि बाकी स्थानांतरित अधिकारी-कर्मचारी अपनी-अपनी सीटों पर बने रहे, लेकिन देवेंद्र वर्मा की रिलीविंग की फाइल ने अकेले ही रफ्तार पकड़ ली।
हालांकि किसी अधिकारी की भूमिका या मंशा को दस्तावेजी जांच के बिना तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता, लेकिन घटनाक्रम प्रशासन से जवाब जरूर मांगता है।
🔴 इंजीनियरों की कुर्सी कायम, सफाई निरीक्षक पर तत्काल अमल क्यों?
मामला सिर्फ सफाई और राजस्व विभाग तक सीमित नहीं है। अभियंत्रण विभाग में भी कई अधिकारियों और अवर अभियंताओं के स्थानांतरण की जानकारी है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक अधिशासी अभियंता अतुल मिश्रा का भी स्थानांतरण हुआ, लेकिन उनके अब तक कार्यमुक्त न होने की बात कही जा रही है। इसी तरह सहायक अभियंता सदानंद तथा जूनियर इंजीनियर नीतू वर्मा, सनी विश्वकर्मा और विकास सिंह समेत अन्य अभियंताओं के संबंध में भी स्थानांतरण के बावजूद नगर निगम में कार्यरत रहने की चर्चा है।
अतुल मिश्रा के एकपक्षीय कार्यमुक्त न होने को लेकर नगर निगम के भीतर उनकी पहुंच से जुड़ी चर्चाएं भी हैं, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में सवाल व्यक्ति विशेष से अधिक नगर निगम की रिलीविंग नीति पर है।
अपर नगर आयुक्त अरुण कुमार गुप्ता को भी कर मुक्त नहीं किया गया।
जलकल विभाग के उत्कर्ष राय भी अभी अपने पद पर जमे हैं।
यदि प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर अभियंताओं तथा दूसरे कर्मचारियों को रोका जा सकता है, तो यही व्यवस्था देवेंद्र वर्मा के मामले में क्यों नहीं अपनाई गई?
🔴 सीनियरिटी की राह में रिलीविंग का ‘सुर’ क्यों?
यदि राम सकल यादव के सेवानिवृत्त होने के बाद वरिष्ठता के आधार पर किसी सफाई निरीक्षक को जोनल सेनेटरी व्यवस्था की जिम्मेदारी दी जानी थी, तो नगर निगम प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि देवेंद्र वर्मा की रिलीविंग उसी समय इतनी आवश्यक क्यों हो गई।
◾क्या देवेंद्र वर्मा को तत्काल दूसरे जिले में ज्वाइन कराने के लिए शासन से कोई विशेष निर्देश था?
◾क्या बाकी स्थानांतरित अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए अलग आदेश हैं?
◾क्या अभियंत्रण विभाग में प्रशासनिक आवश्यकता बताकर अधिकारियों को रोका गया है?
◾यदि हां, तो ऐसी ही प्रशासनिक आवश्यकता सफाई विभाग में क्यों नहीं मानी गई?
🔴 डीएम कार्यालय से भी संबद्ध रहे देवेंद्र
देवेंद्र वर्मा लंबे समय तक जिलाधिकारी कार्यालय से संबद्ध भी रहे हैं। ऐसे में उनकी वरिष्ठता और प्रशासनिक अनुभव को देखते हुए उनकी अकेली रिलीविंग को लेकर कर्मचारियों में चर्चा होना स्वाभाविक है।
नगर निगम प्रशासन यदि पूरे मामले में स्थिति साफ कर दे तो विवाद आसानी से समाप्त हो सकता है। प्रशासन को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि कौन-कौन अधिकारी-कर्मचारी स्थानांतरित हुए, किसे कार्यमुक्त किया गया, किसे रोका गया और इसके पीछे प्रशासनिक आधार क्या है।
एक ही शासन व्यवस्था और एक ही निकाय में यदि अलग-अलग कर्मचारियों पर तबादला आदेश लागू करने का तरीका अलग दिखाई देता है तो सवाल उठना लाजिमी है।
फिलहाल नगर निगम के गलियारों में एक ही सवाल घूम रहा है,
“तबादले की सूची लंबी थी, इंजीनियर और राजस्व कर्मी कुर्सियों पर बने रहे, फिर रिलीविंग की धुन में सिर्फ देवेंद्र वर्मा का नाम ही क्यों बजा?”




