यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ केजीएमयू में विरोध, डॉक्टरों ने जताई असमानता बढ़ने की आशंका

मनीष मिश्रा
लखनऊ। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए प्रस्तावित नए विनियमों का विरोध अब प्रदेश के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों तक पहुंच गया है। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में बुधवार को फैकल्टी सदस्यों, रेजिडेंट डॉक्टरों और कर्मचारियों ने कुलपति कार्यालय के बाहर एकत्र होकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यूजीसी के नए नियम उच्च शिक्षा में समरसता बढ़ाने के बजाय असमानता और अविश्वास को जन्म दे सकते हैं।
प्रदर्शन का नेतृत्व ट्रॉमा सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. संदीप तिवारी के साथ डॉ. समीर मिश्रा, डॉ. प्रेमराज सिंह, डॉ. अमिय अग्रवाल और डॉ. ओपी सिंह ने किया। बड़ी संख्या में मेडिकल छात्र भी इस विरोध में शामिल रहे। डॉक्टरों ने यूजीसी के प्रस्तावित प्रावधानों को एकतरफा बताते हुए मांग की कि सरकार इन्हें तत्काल वापस ले। साथ ही यह भी कहा गया कि नियम लागू करने से पहले शिक्षण संस्थानों से सुझाव और आपत्तियां ली जानी चाहिए थीं।

डॉक्टरों का कहना है कि नए नियमों के तहत प्रस्तावित व्यवस्थाएं कैंपस में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के बजाय उसे और गहरा कर सकती हैं। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, यह मान लिया गया है कि सामान्य वर्ग से जुड़े लोग ही उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार होंगे, जबकि किसी भी मामले में सभी पक्षों को समान रूप से सुने जाने की आवश्यकता होती है
डॉ. समीर मिश्रा ने कहा कि नियमों की भाषा से यह संकेत मिलता है कि सामान्य वर्ग को पहले से ही दोषी मान लिया गया है। इसमें अपनी बात रखने या प्राकृतिक न्याय का अवसर पर्याप्त रूप से नहीं दिया गया है। उनका कहना था कि यदि कोई समिति बनाई भी जाती है तो उसका उद्देश्य भर्तियों और पदोन्नति में पारदर्शिता सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि किसी वर्ग को संदेह के घेरे में रखना।
डॉ. अमिय अग्रवाल ने इसे अव्यावहारिक करार देते हुए कहा कि यह कानून पूर्व में प्रस्तावित कुछ विवादित विधेयकों की तरह प्रतीत होता है, जिसमें सामान्य वर्ग के अधिकारों की अनदेखी की गई थी। उन्होंने कहा कि किसी भी कानून में सभी नागरिकों को समान न्याय का भरोसा मिलना चाहिए।
डॉ. नवनीत चौहान और डॉ. मनीष बाजपेयी ने भी नियमों को तर्कहीन बताते हुए कहा कि यह मान लेना गलत है कि गलती हमेशा किसी एक वर्ग की ही होती है। उनके अनुसार, इन प्रावधानों में संशोधन की गुंजाइश कम है, इसलिए इन्हें पूरी तरह वापस लिया जाना चाहिए।
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प्रदर्शन के दौरान डॉ. संदीप तिवारी ने कहा कि यूजीसी का उद्देश्य भेदभाव रोकना होना चाहिए, न कि किसी वर्ग को असुरक्षित महसूस कराना। उन्होंने कहा कि भारतीय न्याय संहिता में पहले से ही भेदभाव से जुड़े मामलों के लिए पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं, ऐसे में अलग से समता समिति बनाने की आवश्यकता पर पुनर्विचार होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “हम डॉक्टर हैं। इलाज करते समय हम मरीज की जाति या धर्म नहीं देखते। समाज में जब समरसता की दिशा में प्रयास हो रहे हैं, तब ऐसे नियम नए विवाद खड़े कर सकते हैं।”
हालांकि, केजीएमयू शिक्षक संघ के महासचिव डॉ. संतोष कुमार ने इस मुद्दे पर अलग राय रखी। उन्होंने कहा कि यदि सरकार की मंशा जातिगत भेदभाव को बढ़ाने की नहीं है और उस पर भरोसा किया जाता है, तो यूजीसी द्वारा जारी ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026’ का विरोध उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि झूठी शिकायतों की आशंका को देखते हुए भारतीय न्याय संहिता में पहले से ही कठोर दंड का प्रावधान मौजूद है।
फिलहाल यूजीसी के नए नियमों को लेकर केजीएमयू में उठा यह विरोध राज्य के अन्य चिकित्सा और शैक्षणिक संस्थानों में भी चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सरकार और यूजीसी की ओर से क्या रुख अपनाया जाता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
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