Welcome to Soochna India   Click to listen highlighted text! Welcome to Soochna India
भ्रष्टाचारउत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh)उन्नावन्यायपालिकाब्रेकिंग न्यूज़सामाजिक

उन्नाव:- 40-45 वर्षों से लंबित भूमि अभिलेख विवाद पर ग्रामीणों ने उठाई आवाज, उच्च अधिकारियों से न्याय की मांग!!

उन्नाव से जिला संवाददाता अनुज तिवारी

उन्नाव। जनपद उन्नाव के विवादित सर्वे ग्राम कटरी पीपरखेड़ा एवं मझरा पीपरखेड़ा के भूमि स्वामियों द्वारा लंबे समय से चले आ रहे भूमि अभिलेखों और नक्शों में कथित त्रुटियों को लेकर एक बार फिर आवाज बुलंद की गई है। ग्रामीणों ने आयुक्त एवं सचिव, राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश को प्रेषित पत्र के माध्यम से आरोप लगाया है कि पिछले लगभग 40 से 45 वर्षों से भूमि अभिलेखों में चली आ रही त्रुटियों का समाधान आज तक नहीं हो सका है, जिसके कारण सैकड़ों किसानों और भूमि स्वामियों को लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों पूर्व संबंधित अधिकारियों द्वारा स्वयं लिखित रूप में यह स्वीकार किया गया था कि ग्राम के वर्तमान मानचित्र और अभिलेख त्रुटिपूर्ण हैं। इसके बावजूद न तो अभिलेखों का समुचित संशोधन किया गया और न ही राजस्व परिषद एवं उच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित किया गया।

पत्र में उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2002 में तत्कालीन सहायक अभिलेख अधिकारी द्वारा अपने पत्र में यह स्वीकार किया गया था कि ग्राम कटरी पीपरखेड़ा में वर्तमान मानचित्र और अभिलेखों के आधार पर भूमि चिह्नीकरण करना शासन की मंशा के अनुरूप नहीं है। इसके बाद वर्ष 2007 में भी न्यायालयीय आदेश के माध्यम से यह स्वीकार किया गया कि संबंधित ग्राम का वर्तमान मानचित्र एवं अभिलेख निस्तर और निष्प्रभावी हैं, जिनके आधार पर किसी प्रकार की कार्रवाई उचित नहीं होगी।

इतना ही नहीं, वर्ष 2008 में राजस्व परिषद द्वारा जिलाधिकारी उन्नाव को आदेश जारी कर निर्देश दिया गया था कि वर्तमान विवादित मानचित्रों एवं अभिलेखों के स्थान पर वर्ष 1980 के अभिलेखों के आधार पर अभिलेखीकरण की प्रक्रिया पूरी की जाए। ग्रामीणों का आरोप है कि इन आदेशों के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई धरातल पर नहीं हो सकी और विवाद लगातार बना हुआ है।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि त्रुटिपूर्ण अभिलेखों और नक्शों के आधार पर उनकी पैतृक एवं पुश्तैनी भूमि को प्रभावित किया जा रहा है, जिससे भूमि स्वामित्व संबंधी विवाद और अधिक जटिल हो गए हैं। उनका कहना है कि वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे किसानों को प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट और स्थायी समाधान नहीं मिल पाया है।

इस मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह केवल कुछ किसानों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भूमि अधिकारों, राजस्व अभिलेखों की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा विषय है। यदि अभिलेखों में त्रुटियां बनी रहती हैं तो भविष्य में भूमि खरीद-बिक्री, उत्तराधिकार, सरकारी योजनाओं के लाभ तथा राजस्व संबंधी अन्य कार्यों में भी गंभीर कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भूमि अभिलेखों की शुद्धता किसी भी ग्रामीण क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था की आधारशिला होती है। ऐसे में यदि दशकों पुराने विवादों का समयबद्ध समाधान नहीं होता है तो इससे आम नागरिकों का सरकारी व्यवस्था पर विश्वास भी प्रभावित होता है।

ग्रामीणों ने मांग की है कि राजस्व परिषद, जिलाधिकारी तथा संबंधित विभाग इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराते हुए पूर्व में जारी आदेशों का पालन सुनिश्चित करें और दशकों से लंबित इस विवाद का स्थायी समाधान निकालें, ताकि भूमि स्वामियों को राहत मिल सके तथा भविष्य में किसी भी प्रकार के शोषण और विवाद की संभावना समाप्त हो सके।
ग्रामीणों का कहना है कि अब यह मामला केवल अभिलेख सुधार का नहीं, बल्कि न्याय, पारदर्शिता और किसानों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का विषय बन चुका है।

Anuj Tiwari

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Click to listen highlighted text!