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महंगे किताबों का खेल: नए सत्र में अभिभावकों पर बोझ, चुनिंदा दुकानों तक सीमित सप्लाई

स्कूल–प्रकाशक गठजोड़ पर सवाल, कमीशनखोरी के आरोप; मिशनरी स्कूल भी विवाद में

लखनऊ। शहर में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही अभिभावकों पर महंगाई की मार पड़नी शुरू हो गई है। निजी स्कूलों की ओर से जारी बुक लिस्ट ने जहां बच्चों की पढ़ाई की तैयारी शुरू कराई, वहीं किताबों के बढ़े दाम और सीमित उपलब्धता ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है।

चुनिंदा दुकानों तक सीमित किताबें

अभिभावकों का आरोप है कि कई बड़े निजी स्कूलों—जैसे डीपीएस इंदिरा नगर और सेठ एमआर जयपुरिया—की किताबें शहर की चुनिंदा दुकानों पर ही उपलब्ध कराई जा रही हैं। इससे अभिभावकों के पास विकल्प खत्म हो रहे हैं और उन्हें तय दुकानों से ही किताबें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

महंगी किताबों का बढ़ा बोझ

बुक सेट के दाम पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक बताए जा रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि एक ही कक्षा की किताबों पर हजारों रुपये अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है।
कमीशनखोरी का खेल, 60% तक मार्जिन के आरोप
सूत्रों के अनुसार, स्कूलों और पुस्तक प्रकाशकों के बीच भारी कमीशनखोरी का खेल चल रहा है। आरोप है कि किताबों के सेट पर 50 से 60 प्रतिशत तक का मार्जिन तय किया जाता है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ रहा है।

यूनिवर्सल हजरतगंज का मामला चर्चा में

सबसे चौंकाने वाला मामला हजरतगंज स्थित सेंट फ्रांसिस स्कूल का सामने आया है। यहां की बुक लिस्ट में शामिल किताबें केवल हजरतगंज के एक ही स्टोर—यूनिवर्सल—पर उपलब्ध बताई जा रही हैं।
अभिभावकों का कहना है कि अन्य दुकानों पर ये किताबें नहीं मिल रही हैं, जिससे उन्हें मजबूरी में उसी दुकान से खरीदारी करनी पड़ रही है।


कुछ किताबें अब तक छपी ही नहीं
स्थिति यह भी है कि कई किताबें अभी तक बाजार में आई ही नहीं हैं। ऐसे में अभिभावक अधूरी किताबों के साथ बच्चों की पढ़ाई शुरू कराने को विवश हैं।

प्रबंधन का गोलमोल जवाब

स्कूल प्रबंधन से संपर्क करने पर स्पष्ट जवाब नहीं मिला। मैनेजर ने इस विषय पर प्रिंसिपल से बात करने की बात कही, जबकि प्रिंसिपल से संपर्क नहीं हो सका। इससे अभिभावकों की शंकाएं और गहरी हो गई हैं।
मिशनरी स्कूलों के उद्देश्य से उलट स्थिति
मिशनरी स्कूलों की स्थापना मूल रूप से सेवा, शिक्षा और समाज के कमजोर वर्गों को सुलभ शिक्षा देने के उद्देश्य से की गई थी। इन संस्थानों से अपेक्षा रहती है कि वे पारदर्शिता और मानवता के मूल्यों पर आधारित व्यवस्था अपनाएं।
हालांकि, मौजूदा हालात इन मूल उद्देश्यों के विपरीत नजर आ रहे हैं, जहां किताबों को लेकर भी व्यावसायिक लाभ प्राथमिकता बनता दिख रहा है।

पुरानी व्यवस्था: हर दुकान पर मिलती थीं किताबें

पूर्व प्रिंसिपल फादर एल्विन मोरास के कार्यकाल में स्थिति अलग थी। उस समय स्कूल की किताबें शहर के कई प्रमुख स्टोर्स पर आसानी से उपलब्ध होती थीं। अभिभावकों के पास विकल्प होते थे और कीमतों में भी प्रतिस्पर्धा बनी रहती थी।
नई व्यवस्था में बड़ा बदलाव
नए प्रिंसिपल के कार्यभार संभालने के बाद किताबों की उपलब्धता और वितरण व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अब किताबें सीमित दुकानों तक सिमट गई हैं, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।

अभिभावकों की मांग: जांच और पारदर्शिता

अभिभावकों ने प्रशासन से मांग की है कि इस पूरे मामले की जांच कराई जाए और स्कूलों को निर्देश दिए जाएं कि किताबें सभी प्रमुख दुकानों पर उपलब्ध कराई जाएं, ताकि उन्हें उचित दाम पर खरीदने का विकल्प मिल सके।

मनीष मिश्रा
राज्य संवाददाता,
सूचना इंडिया न्यूज़ चैनल

मनीष मिश्रा पिछले 7 वर्षों से सूचना इंडिया न्यूज़ चैनल के साथ राज्य संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं, और लखनऊ नगर निगम से संबंधित खबरों को गंभीरता के साथ जनता के समक्ष लाने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने लखनऊ शहर के नागरिकों के सड़क, पानी, स्ट्रीट लाइट, सीवर और सफाई जैसी महत्वपूर्ण समस्याओं को नगर निगम के अधिकारियों के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। उनकी रिपोर्टिंग की बदौलत नगर निगम के संबंधित अधिकारियों ने इन मुद्दों को गंभीरता से लिया और निस्तारण के लिए सक्रिय कदम भी उठाए। मनीष का उद्देश्य हमेशा से जनहित के मुद्दों को उजागर करना और प्रशासन को जिम्मेदार बनाना रहा है, जिसके लिए वह पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान बनाए हुए हैं।

Mishra Manish

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