Gender-Based Injustice and Misuse of the Law: समाज में पुरुषों के साथ अन्याय कब तक?
Gender-Based Injustice and Misuse of the Law: The Silent Struggle of Men in Marriage

लड़कों के साथ यह भेदभाव कब तक? एक जरूरी सवाल!
मैंने पहले भी समाज में पुरुषों के साथ हो रहे भेदभाव पर लिखा था – ‘क्या पुरुष होना एक अभिशाप है ? एक पुरुष की व्यथा कथा।’ और आज, अतुल सुभाष के साथ हुई घटना ने मेरे दिल और दिमाग को गहराई से झकझोर दिया है, जिसने मुझे एक बार फिर ‘समाज में पुरुषों के साथ अन्याय कब तक?‘ जैसा लेख लिखने पर मजबूर कर दिया है।
हम अकसर सुनते हैं, “लड़कियाँ अपना सब कुछ छोड़कर आती हैं।” लेकिन क्या यह सच में पूरी कहानी है?
ज़रा सोचिए, लड़के भी तो शादी के बाद अपना घर-परिवार छोड़ते हैं। वे भी पत्नी को लेकर एक अलग मकान में बसते हैं। फिर क्यों इसे केवल लड़कियों का त्याग माना जाता है?
शादी के बाद लड़कों का संघर्ष
शादी के बाद लड़के अपने ससुराल और रिश्तेदारों के यहाँ समय बिताते हैं, पर अपने गाँव, मामा, फुआ, या दोस्तों से दूर हो जाते हैं। उनकी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ पूरी करने के लिए उनके पास समय नहीं बचता। कहने को कानून लड़के और लड़की को समान मानता है, लेकिन हकीकत कुछ और है।
लड़कों को हर जगह भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
लड़की का आदर्श स्वरूप और लड़कों का त्याग
अगर एक लड़की अच्छी पत्नी, माँ और बहू के रूप में अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करती है, तो उसका सम्मान होता है। लेकिन सवाल यह है कि जो लड़के अपनी सारी इच्छाएँ त्यागकर पत्नी और परिवार की ख़ुशियों में अपनी ख़ुशी ढूँढते हैं, उनके त्याग को क्यों नहीं सराहा जाता?
शादी के बाद लड़का न केवल अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाता है, बल्कि अपनी संपत्ति पर भी पत्नी का अधिकार सुनिश्चित करता है। लेकिन अगर पत्नी बुरी निकले, तो लड़के और उसके परिवार की ज़िंदगी तबाह हो जाती है। Atul Subhash जैसे मामलों में हमने देखा है कि कैसे कानून, समाज, और सिस्टम लड़के के साथ अन्याय करते हैं।
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तलाक के समय लड़कों के अधिकार क्यों नहीं?
अगर शादी दोनों की हुई है, तो तलाक के समय लड़के से गुजारा भत्ता क्यों माँगा जाता है?
लड़के की पैतृक संपत्ति में पत्नी का हिस्सा होता है, पर लड़की की पैतृक संपत्ति में लड़के का हिस्सा क्यों नहीं? क्या यह स्पष्ट भेदभाव नहीं है?
लड़का और लड़की दोनों अपने परिवार और रिश्तेदारों से दूर होकर एक नया जीवन शुरू करते हैं। फिर जब बात तलाक तक पहुँचती है, तो सजा सिर्फ लड़के और उसके परिवार को क्यों मिलती है?
समाज, कानून और सिस्टम की जिम्मेदारी
आज का समाज, कानून, और सिस्टम लड़कों के साथ न्याय करने में नाकाम है। यह भेदभाव आखिर कब तक जारी रहेगा? अगर समय रहते इस लिंग आधारित भेदभाव को नहीं रोका गया, तो लड़के शादी जैसी व्यवस्था से दूर हो सकते हैं।
भविष्य की तस्वीर: क्या होगा अगर लड़के शादी करना छोड़ दें?
अगर लड़के ऐसी समस्याओं से बचने के लिए शादी से मुँह मोड़ लें, तो समाज में अनैतिक रिश्ते और अपराध बढ़ सकते हैं।
समाज और संस्कृति नष्ट हो सकती है। इन अनैतिक रिश्तों से पैदा होने वाले बच्चों का भविष्य क्या होगा? क्या वे एक माता-पिता की तरह सम्मान और देखभाल पा सकेंगे?
समय रहते हमें बदलाव की ज़रूरत है!
यदि हम इस Gender-Based Injustice and Misuse of the Law को नहीं रोकते, तो वह दिन दूर नहीं जब हर घर की स्थिति Atul Subhash के घर जैसी होगी। यह सिर्फ लड़कों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की समस्या है।
क्या आप भी मानते हैं कि लड़कों के साथ भेदभाव हो रहा है? अपनी राय ज़रूर साझा करें। बदलाव हम सबके साथ से ही आएगा!




