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दुनिया का सबसे बडा खजाना है माँ : डॉ कुलदीप सारस्वत

मां होना दुनिया के सबसे बड़े खजाने के होने जैसा है। यदि किसी के पास मां है तो उसके पास सब कुछ है, अगर मां नहीं है तो वह सबसे गरीब है। दरअसल, हम सबके जीवन में मां की इतनी संवेदनाएं जुड़ी होती हैं कि उनके बिना हम बिल्कुल खोखले हो जाएंगे। हमारी इच्छाएं, आदतें, शौक, मिजाज और ख्वाब सब मां का ही दिया हुआ है। मां की ममता, करुणा और समर्पण के कारण ही हम जीवन में एक इंसान कहे जाने के योग्य बन पाते हैं। मां माटी से बनी देह में भावों का गहना पहनाती है। उठने-बैठने और चलने का सलीका सिखाती है। मां ही है जो हमारे भीतर आई निर्दयता निर्मलता को बाहर निकाल हमें मनुष्यता के सांचे में ढालती है। इसलिए मां दुनिया का सबसे बेशकीमती खजाना है।

हम मां की यादों से कुछ यूं बंधे रहते हैं जैसे माला में धागा। अपनी नसीहतओं के जरिए मां ता उम्र हमारे साथ मौजूद रहती है। जीवन के हर मोड़ पर हमें मां की जरूरत होती है। वैसे तो हमें जीवन की युद्धभूमि में अकेला छोड़ने से पहले मां हमें अपनी सिखों और समझइशों के शस्त्र से अच्छी तरह लैस कर देती है। फिर भी अगर हम किसी संकट में फंस जाएं और किसी कारणवश कोई भी मार्ग न सूझे, तो हम लौटकर मां के पास ही आते हैं। मां हमसे दूर रहकर भी किसी न किसी रूप में हमें सही रास्ता दिखाने आती है। कभी हमारे दिल की आवाज बन, कभी किसी बड़े के मुंह से निकले आशीर्वचन बनकर, मां सदेव हमारे साथ रहती है। यदि मां की नसीहतें जीवन भर गांठ बांधकर रख लें तो यह आड़े वक्त में सही राह दिखाती हैं।

हर किसी के पास अपने बचपन और मां से जुड़े किस्से कहानियां होती हैं। लेकिन हर कहानी की बुनावट में दुनिया की तमाम मांएं एक जैसी ही है होती हैं। जैसे प्यार करने वाली, हमारी गलतियों को माफ करने वाली, हर बार समझाने वाली, पिता की डांट से बचाने वाली, हमारी जिंदगी को पूरा करने वाली, हमारी फिक्र में अपने आपको को भुला देने वाली, हमारे सपनों को अपने हमारे सपनों को परवाज़ देने वाली। इस संसार में मां की चाहत जितना सुंदर, सलोना और सुखद कुछ भी नहीं है। जब मां हमसे दूर होती है तो हम सब उसकी यादों के सहारे अपने आप को संतुष्ट करते हैं।

हर हम हर जगह मां जैसा प्यार तलाशने की कोशिश करते हैं। हम आप इस उदाहरण से इस बात को समझें हिंदुस्तानी लड़के को अमेरिका की एक कंपनी से जॉब का ऑफर आया, वह खुश हुआ उसने मां की आज्ञा ली और अमेरिका चला गया। उसे अच्छी जॉब, अच्छा घर और अच्छी सब सुख सुविधाएं मिली। फिर भी उसे कुछ अखरता रहा। उसने सोचा, खूब सोचा, तब समझ में आया कि उसे तो हर घड़ी मां के प्यार की कमी महसूस होती है। वह खाने में मां के हाथों का स्वाद तलाशता है, घर में मां की उपस्थिति, कपड़ों में मां का स्पर्श खोज रहा है। असल में बचपन से हम मां के स्नेह के इतने आदी हो जाते हैं कि हर रिश्ते में उसे तलाश करते हैं।

मां हर हाल में मां होती है। अपनी मूल प्रवृत्ति को कभी नहीं छोड़ती। एक मां अपने शिशु के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच होती है। जब इंसान अपनी जिंदगी की भाग दौड़, टारगेट, उलझनों से थककर सुकून चाहता है तो वह मां की गोद तलाशता है। उसे अपनी बूढ़ी मां की हथेलियों का स्पर्श एक जादू ऐसा सा लगता है। उसकी सारी निराशा, दुख और अवसाद को कमजोर हड्डियों वाली मां लपक-झपकते ही दूर कर सकती है। इसलिए संतान के लिए मां दुआ भी है और दवा भी। मां को शब्दों में बयां करना आसान नहीं है। मां तो स्नेह कि एक ऐसी डोर है जिसमें बांधकर हम दुनिया के सबसे खुशनसीब इंसान हो जाते हैं। जिस तरह प्रकृति हमें सिर्फ देना जानती है, उसी तरह मां आजीवन अपने स्नेह के जल से हमें सिंचित करती रही है और हमें सदैव खुश रखती है।

मांएं ममतामयी होती है। अपने बच्चे के लिए अपना सर्वस्व लुटा देती है। फिर भी कोई मां ममतामयी मांएं संतान की अपेक्षा का शिकार बनती है। वृद्ध आश्रम में छोड़ दी जाती हैं। बचपन में जिस मां के पहलू से निकलना हमें एक दिन भी गवारा नहीं था, वही मां अब बरसों बरस तक हमारे लौटने की प्रतीक्षा में गुजार देती है। मां बूढ़ी होकर भी मां बनी रहती है। लेकिन हम बड़े होने के साथ बदल जाते हैं। क्या जीवन भर हम पर प्यार लुटाने वाली मां बूढ़ी होने पर हमारे प्यार और सम्मान का अधिकार नहीं? मदर्स डे के ही बहाने हम अपनी मां को उसके उपकारों के बदले थोड़ा सा प्यार जरूर दें।

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